Saturday, June 25, 2016

जाय़का-ए-दिल्ली

जाय़का-ए-दिल्ली

देश की राजधानी दिल्ली, राजनीतिक केन्द्र के साथ अपने जायके के लिए भी प्रसिद्ध है गलियों के लजीज व्यंजनों से लेकर सात- सितारा होटलों के व्यंजनों में आपको देश के विभिन्न हिस्सों के व्यजंनो के साथ विदेशी व्यंजनों का स्वाद भी मिलेगा है। चांदनी चौक को प्रायः भारत की फूड-कैपिटल भी कहा जाता है जो अपने स्ट्रीट फूड के लिए प्रसिद्ध है जहाँ  स्नैक्स, चाट, पराठे, नमकीन के साथ ही मांसाहारी खानों के पुराने शौकीन हैं, वे मोती महल में बटर-चिकन का लुत्फ उठा सकते हैं।
तो आइयें जानते है दिल्ली के प्रसिद्ध व्यंजनों के बारे में
पराठे वाली गली के पराठे
पराठे वाली गली एक सकरी गली चाँदनी चौक नामक प्रसिद्ध बाज़ार में स्थित है। वहां काफी पुरानी पराठे बनाने वाली दुकाने हैं। यह एक भारतीय रोटी का विशिष्ट रूप है। यह व्यंजन उत्तर भारत में जितना लोकप्रिय है, लगभग उतना ही दक्षिण भारत में भी है, बस मूल फर्क ये है, कि जहां उत्तर में आटे का बनता है, वहीं दक्षिण में मैदे का बनता है। माना जाता है यहाँ के दुकानदार मुगलों के समय से पराठे बेच रहे हैं। जिसमे आपको पनीर,रबडी,गोभी,आलू,खोया,बादाम के पराठा प्रमुख है।
दिल्ली की चाट
दिल्ली की चाँदनी चौक की चटपटी चाट बहुत प्रसिद्ध है और अब तो यह दिल्ली चाट के रूप में भारत के कई हिस्सों मे बेची जाती है। यह चाट मिर्च मसाले से भरपूर होती है। यह चाट खाने मे जितनी स्वादिष्ट होती है

दिल्ली हाट का जायका
दिल्ली हाट में मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन 'दिल्ली हाट' को ख़ास बनाते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों के व्यंजन की दुकानें यहाँ लगी हैं। 1994 में जब दिल्ली हाट की शुरुआत हुई थी तब देश के सभी पच्चीस राज्यों को यहाँ व्यंजन की दुकानें उपलब्ध करायी गई थीं ताकि यहाँ आने वाले लोग दूसरे प्रांतों के व्यंजनों का भी स्वाद ले सकें। भौगोलिक रूप से विविधताओं का देश तो हिन्दुस्तान है ही यहाँ के खान-पान में भी काफ़ी विविधता है। दिल्ली हाट में देश के सौ से ज़्यादा ख़ास व्यंजन उपलब्ध हैं। पंजाब के मक्के दी रोटी सरसों दा सागहो, बंगाल के माछेर-झोलऔर दक्षिण भारत के इडली डोसाहो यहाँ सभी उपलब्ध हैं। यहाँ बिहार के मशहूर लिट्टी-चोखा भी मिलता है।

Tuesday, June 14, 2016

कहानी जिंदगी की


जिंदगी में कभी- कभी कुछ ऐसा वाक्या भी हो जाता है जिससे जिदंगी बदल ही जाती है। समय था यही कोई शाम के सात बज रहे होगें, मैं और मेरा मित्र एक होटल में खाना खा रहे थे इसी दौरान एक बुर्जुग व्यक्ति नम आँखे लिए हमारी पास वाली टेबिल पर आकर बैठ गया। खाने का ऑर्डर लेने के लिए वेटर आया,शायद उस व्यक्ति ने  दाल-रोटी ऑर्डर किया था और वह व्यक्ति खाने के इंतजार में था, उस व्यक्ति के अकेलेपन को हम लोग भाप गये थे तो हमने उन्हे हम लोगे के साथ खाना खाने का आग्रह किया,पर वह मना करने लगे, किंतु हमारे बार-बार आग्रह करने वह मान गये और हमारे साथ आकर बैठ गये। तब तक वेटर खाना ले कर आ गया था और  खाने के साथ हमारी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया, उन्होने बताया कि वह रिटायर्ड IAS ऑफिसर है जो पास ही कॉलोनी में रहते है उनके दो बेटे और एक बेटी भी है दोनों बेटे विदेश मैं नौकरी करते है व बेटी मुम्बई में अपने परिवार के साथ रहती है।

हमने पूछा आपकी पत्नी कहाँ है तो वह शांत स्वर में बोल उठें। पिछले बर्ष ही निधन हो गया था और आँखे नम हो गयी।तो मेरे जहन मैं सवाल उठा आप अपने बेटों के साथ क्यों नहीं  रहतें? इस सवाल पर उनका सीधा जबाव था मैं जीवन के इस अंतिम दौर में अपनों से दूर नहीं रहना चाहता।
सवाल का  जबाव सुन कर हम दोनों आश्चर्यचकिंत हो गयें। तो उन्होंने बताया दोनों बेटों को दिन- रात अपनी नौकरी से समय नहीं मिलता। उनके पास बात करने का भी समय नहीं रहता,मैं उन लोगों के  साथ रहता हूँ तो मुझे ऐसा प्रतित होता है कि मैं होटल में रह रहा हूँ वहाँ सुविधायें तो सारी है किंतु सुकून नहीं है  जिंदगी भर ऐसे ही भाग दौड़ में दिन निकाले है अब मैं जीना चाहता हूँ तो आ गया अपनों के बीच। जहाँ मित्र मंडली, ओर जान-पहचान वालो से तो बात तो हो जाती है।
कभी-कभी बेटी के यहाँ भी  घूम आता हूँ किंतु वह लोग भी अपनी जिदंगी में व्यस्त है। तो आ जाता  हूँ अपने पुराने निवास स्ठान। जहाँ मेरा सारा बचपन व्यतित हुआ था।  बस थोड़ा दुख तब होता है जब अकेले खाना-खाने होटल में बैठता  हूँ और इसी चर्चा के साथ हमारा खाना हो चुका था  वेटर बिल लेकर आया।  जिसका पेमेंट उन्होंने ही किया।

साथ ही विदा लेते हुये उस इंसान केअंतिम शब्द थे

जिंदगी जीने का नाम है

Sunday, June 5, 2016

धर्म पर हावी होती राजनीति

एक दौर था लोग अपने धर्म के प्रति गहन आस्था रखते थे धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कई धार्मिक आयोजन कराये जाते थे किंतु आज वक्त बदल गया है लोगों के बीच आज धर्म व्यापारिक हो चला है वह धर्म से अपना प्रचार-प्रसार करते नजर आने लगे हैं कहीं कोई धार्मिक आयोजन व्यापार बढ़ाने तो कहीं राजनीतिक दलों के प्रचार के लिए धार्मिक आयोजन किए जाने लगे हैं जिन आयोजनों में वैदिक मंत्रों से ज्यादा तो राजनीतिक लोगों के नाम सुनाई ज्यादा देने लगे हैं। तो बताइए इन धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए या नहीं।