Tuesday, June 14, 2016

कहानी जिंदगी की


जिंदगी में कभी- कभी कुछ ऐसा वाक्या भी हो जाता है जिससे जिदंगी बदल ही जाती है। समय था यही कोई शाम के सात बज रहे होगें, मैं और मेरा मित्र एक होटल में खाना खा रहे थे इसी दौरान एक बुर्जुग व्यक्ति नम आँखे लिए हमारी पास वाली टेबिल पर आकर बैठ गया। खाने का ऑर्डर लेने के लिए वेटर आया,शायद उस व्यक्ति ने  दाल-रोटी ऑर्डर किया था और वह व्यक्ति खाने के इंतजार में था, उस व्यक्ति के अकेलेपन को हम लोग भाप गये थे तो हमने उन्हे हम लोगे के साथ खाना खाने का आग्रह किया,पर वह मना करने लगे, किंतु हमारे बार-बार आग्रह करने वह मान गये और हमारे साथ आकर बैठ गये। तब तक वेटर खाना ले कर आ गया था और  खाने के साथ हमारी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया, उन्होने बताया कि वह रिटायर्ड IAS ऑफिसर है जो पास ही कॉलोनी में रहते है उनके दो बेटे और एक बेटी भी है दोनों बेटे विदेश मैं नौकरी करते है व बेटी मुम्बई में अपने परिवार के साथ रहती है।

हमने पूछा आपकी पत्नी कहाँ है तो वह शांत स्वर में बोल उठें। पिछले बर्ष ही निधन हो गया था और आँखे नम हो गयी।तो मेरे जहन मैं सवाल उठा आप अपने बेटों के साथ क्यों नहीं  रहतें? इस सवाल पर उनका सीधा जबाव था मैं जीवन के इस अंतिम दौर में अपनों से दूर नहीं रहना चाहता।
सवाल का  जबाव सुन कर हम दोनों आश्चर्यचकिंत हो गयें। तो उन्होंने बताया दोनों बेटों को दिन- रात अपनी नौकरी से समय नहीं मिलता। उनके पास बात करने का भी समय नहीं रहता,मैं उन लोगों के  साथ रहता हूँ तो मुझे ऐसा प्रतित होता है कि मैं होटल में रह रहा हूँ वहाँ सुविधायें तो सारी है किंतु सुकून नहीं है  जिंदगी भर ऐसे ही भाग दौड़ में दिन निकाले है अब मैं जीना चाहता हूँ तो आ गया अपनों के बीच। जहाँ मित्र मंडली, ओर जान-पहचान वालो से तो बात तो हो जाती है।
कभी-कभी बेटी के यहाँ भी  घूम आता हूँ किंतु वह लोग भी अपनी जिदंगी में व्यस्त है। तो आ जाता  हूँ अपने पुराने निवास स्ठान। जहाँ मेरा सारा बचपन व्यतित हुआ था।  बस थोड़ा दुख तब होता है जब अकेले खाना-खाने होटल में बैठता  हूँ और इसी चर्चा के साथ हमारा खाना हो चुका था  वेटर बिल लेकर आया।  जिसका पेमेंट उन्होंने ही किया।

साथ ही विदा लेते हुये उस इंसान केअंतिम शब्द थे

जिंदगी जीने का नाम है

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