घर से दो कदम दूर ही चला था कि इतने में पीछे से आवाज आई...सुन पिछली राखी काम का बहाना बनाकर घर की तरफ मुंह नहीं किया था इस बार ऐसा नहीं चलेगा....ओर ये मुझे पोस्ट कार्ड, पेटीएम वाला रक्षा बंधन तो बिल्कुल पसंद नहीं...जब तक खुद के हाथों से तुम्हारी कलाई पर राखी न बांधू तब तक ये रक्षा बंधन अधूरा सा लगता है...और ये फोन पर ठीक से लड़कर अपना हक भी तो नहीं निकलता...इस बार मुझे ये नहीं सुनना की सॉरी...अगले रक्षा बंधन जरुर आ जाऊंगा...वैसे गर्लफ्रेंड के लिए तो रातों रात मुझ से उधारी लेकर ट्रेन के जनरल कोच से उसके शहर तक पहुंच जाता था...लेकिन जब मैं राखी पर बोलती हूं बहानों का अंबार लगा देता है...अगर इस बार राखी पर तू मुझे नहीं दिखा तो तेरी सारी करतूत पापा के सामने होंगी...
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