Wednesday, May 5, 2021
हिस्सों में जिंदगी
हम गांव के बच्चे ज़िंदगी को हिस्सों में जीते हैं । और हमारी ज़िंदगी के हिस्से ख़त्म होकर शुरू नहीं होते, शूरू होकर ख़त्म हो जाते हैं । मतलब ज़िंदगी के किसी हिस्से को छोड़कर अगले हिस्से में नहीं जाते हैं हम, बल्कि अगले हिस्से में जाते हैं, तो पिछला छूट जाता है। थोड़ा कठिन हो गया ना चलिए आसान बनाते हैं।
गांव से शहर जाते हैं तो गांव छूट जाता है । छोड़कर नहीं जाते, हां लेकिन छूट जाता है । छूट जाता है वो आंगन जहां घुटनों के बल चलना सीखा था । वो छत भी छूट जाती है जहां लेटकर आसमान को देखते हुए तारे गिना करते थे । गांव की गलियां, खेत-खलियान, बाग-बगीचा, ताल-तलैया सब छूट जाता है। गांव के बाहर वाला तिराहा, तिराहे पर समोसे वाली दुकान भी छूट जाती है । बचपन के दोस्त छूट जाते हैं । बाबा की बातें छूट जाती हैं । अम्मा के किस्से छूट जाते हैं। और छूट जाता है बचपन भी । हां लेकिन, ये सब छोड़कर हम शहर नहीं जाते, ये सब छूट जाता है, जब हम शहर जाते फिर शहर से बड़े शहर जाते हैं, तो शहर छूट जाता है ।
छोड़कर नहीं जाते, हां लेकिन छूट जाता है । छूट जाता है किराये का वो कमरा, जहां दोस्तों के साथ तहरी पकाते थे । छूट जाती है वो मेज-कुर्सी जिसपर बैठकर रट्टा लगाते थे । वो रहती है जिस कॉलोनी में उसमें आना-जाना छूट जाता है । चाय का वो अड्डा छूट जाता है, जहां शर्मा जी और वर्मा जी सरकारी नौकरी के आवेदनों पर चर्चा किया करते थे । शहर की वो टॉकीज़ भी छूट जाती है, जहां दोस्तों के साथ पहली फिल्म देखी थी । और छूट जाता है वो बस स्टॉप भी, जहां से गांव की बस मिला करती थी । हां लेकिन, ये सब छोड़कर बड़े शहर नहीं जाते हम, ये सब छूट जाता है, जब बड़े शहर जाते हैं हम ।
और फिर बड़े शहर में तो बहुत कुछ छूट जाता है, बस बड़ा शहर नहीं छूटता । तब तक जब तक ज़िंदगी नहीं छूटती ।
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