वक्त गुजरता रहा,
शामें ढलती रही।
फिर भी न जाने क्यों?
उम्मीद का दीपक,...
हर सुबह जलता रहा।
कभी तो वक्त की राहों में,
कोई मुसाफिर आएगा।
जो इस जलते हुए दीपक को,
नई दिशा दिखायेगा।
उसी अनजाने मुसाफिर के वास्ते,
ये वक्त गुजरता रहा।
#मुसाफिर
#मुसाफिर
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