Wednesday, March 23, 2016

‘शहर के रंगो के साथ खो गई। गाँव की होली’

आज मुझे गाँव को छोड़े हुए एक दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है शहर की आवोहवा में मैंने न जाने कितने त्यौहारों को देखा है फिर भी न जाने जब भी कोई त्यौहार आता हैं मुझे गाँव ओर बचपन की याद आ ही जाती है फिलहाल तो होली के त्यौहार का आगमन हो रहा है होली का नाम सुनते ही मेरे मन-मतिष्क में बचपन ओर गाँव की होली के चित्र उभरने लगते है जहाँ सुनहरे खेत, गाँव की तंग गलियाँ ओर होली का उत्साह गाँव के प्रत्येक युवा, बड़े-बूड़े के साथ महिलाओं पर भी  खूब रहता था होली की पूर्व संध्या में ढोल-बाजे, फगुआ गीतो के साथ गाँव की प्रत्येक गली से जुलूस के साथ घूमना। अर्धरात्री में सामूहिक होली दहन। ओर सुबह होते ही यारों की टोली के साथ रंग- गुलाल से  होली के स्वागत करना। इसी के साथ होली के रंग, मेल- मिलाव,खाना –पीना रंग पचंमी तक चलता रहता था किंतु आज शहर में आने के साथ होली के रंग भी बदले से नजर आने लगे है यहाँ कैमिकल से रंगो का रंग तो गहरा हो गया है पर आपसी रंग फिके नजर आते  है होली तो होती है सिर्फ व्यापार की, स्वार्थ की , मतलब की। शायद शहर की व्यस्त जिंदगी में कुछ ही लोग मिलते है जो होली के रंगो को निस्वांर्थ भावना से देखते है।

 

इसी के साथ ही सभी परिजनों एवं मित्रों  को होली की अनंत शुभकामनाँए।

                                                    अखिलेश

                                                  9630263621

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