Wednesday, October 5, 2016

खोज असली भारत की

घुम्मकड़ी की आदत से मजबूर होने के कारण इस बार जा पहुँचे हम विदिशा जिले के तब्बकलपुर गाँव स्थित सरकारी स्कूल, सोचा आज यहाँ भी घूम लिया जाये।
तो फिर क्या था स्कूल के गेट के सामने गाड़ी रूकते ही स्कूल की तरफ देखकर लगा देश में तो 19 वी सदी चल रही है और हम फालतू में किताबों में 21 वी सदीं का नारा लगाये बैठे है फिर याद आया नहीं भाई आधे देश में 21 वी सदीं है और आधे देश में तो अभी 19 वी सदी ही चल रही है
स्कूल का नजारा देखकर लगा। क्या स्कूल ऐसा भी होता है?
इसके आगे क्या कहूँ तस्वीरों से समझ जायें।









Thursday, September 8, 2016

“इंटरकनेक्ट बैडविड्थ” के लिए अदालत जायेगा। जियो


(By-Akhilesh Kushwah)
देश का शायद यह पहला मामला होगा जब दूरसंचार क्षेत्र से जुड़ी तमाम छोटी- बड़ी कम्पनियों ने रिलायंस जयो को अतिरिक्त इंटरकनेक्ट  बैडविड्थ देने से मना कर दिया। दूरसंचार कम्पनियों का यह कदम दूरसंचार लाइंसेस के प्रावधान के खिलाफ है जिसमें इंटरकनेक्ट पॉइट देना कानूनी तौर पर अनिवार्य है आपको पता हो कि रिलायंस जियो ने देश में मोबाइल सेवा शुरू करने के पहले ही देश भर में फ्री वॉयस कॉल पर कोई शुल्क नहीं लेने का ऐलान कर दिया था
         मुकेश अंबानी की  कम्पनी रिलायंस जियो को दूरसंचार विभाग की तरफ से भेजे गये खत में कहा कि ट्राई अधिनियम 1997 की धारा 11(1) बी के मुताबिक विभिन्न सेवा प्रदाताओं के बीच इंटरकनेक्टिविटी से संबंधित मामला ट्राई के अधिकार क्षेत्र में आता हैं दूरसंचार विभाग ने कहा की इंटरकनेक्टिविटी विवाद का समाधान संबंधित पक्षों की सहमति से किया जायेंगा।

Friday, July 1, 2016

रियल स्टेट कारोबार में मंदी का दौर जारी


रियल स्टेट कारोबार में मंदी का दौर जारी

कारोबार। रियल स्टेट कारोबार में बीते चार सालों से शुरू हुई मंदी अब भी जारी है, हालांकि इस वर्ष के शुरूआती दौर में इसके समाप्त होने की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन इससे जुड़े लोग इसमें कृत्रिम स्थायित्व बनाए बैठे है।कारोबारी दृष्टि से देखे तो इन्हें मंदी नजर नहीं आ रही है,लेकिन जमीनी हकीकत मंदी को बया कर रही है।
चार साल तक पहले दलालों के द्वारा कृत्रिम तेजी और कालेधन के बूते जमीनों के दाम आसमान को छूने लगे थे। पिछले कुछ सालों में केन्द्र सरकार के कालेधन पर लगाम लगाने व ई-रजिस्ट्री शुरू किए। जाने के कारण जमीन के कारोबार में गिरावट आई है।इसी कारण पहले क्रयता ज्यादा और विक्रेता कम थे।वर्तमान में विक्रेता ज्यादा और क्रयता कम है। जिससे रियल एस्टेट कारोबार प्रभावित हुआ है।चार साल पहले तक रियल एस्टेट बाजार में बूम थी। लोग जमीनों और मकानों में निवेश कर रहे थे। दलालों,जमीन के सौदागरों और कालेधन के निवेश के बदौलत जमीन का कारोबार आसमान छूने लगा था। शहर के प्लॉट हो या खेती की जमीन सभी के भाव जरूरतमंदो की पहुंच से बाहर हो गए थे। यह बनावटी तेजी थी, जो लोग मानने को तैयार नहीं है कि कारोबार में किसी प्रकार की मंदी आई है। रियल स्टेट के कारोबार में निर्माण कार्य कम होने की वजह से इस फील्ड से जुड़े लोगों को पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है कि यह लोग दूसरे छोटे मोटे काम को करके जीवन यापन कर रहे है।

मंदी का दौर किस कदर जारी है इसका अनुमान इस साल अप्रैल से शुरू हुई ई रजिस्ट्रियों के आंकड़ों से लगाया जा सकता है।निर्माण कार्य में लगी एजेंसी के लोग कहते हैं कि सरकार ने नियमों को लचीला नहीं बनाया, जिसके कारण हमारा लगातार इस कारोबार से मोह भंग हो रहा है फिलहाल, जरूरी है कि सरकार इस क्षेत्र के लिए अपने कानून में थोड़ा लचीलापन लाए तो जनता को घर भी मिलेगा. कारोबारियों का कारोबार आगे बढ़ेगा तो सरकार का राजस्व भी बढ़ेगा।



उम्मीद के भरोसे बैठे है जमीन के सौदागर
जमीन के सौदे में जिन लोगों ने पैसा लगा रखा है। उन्हें उम्मीद है कि इसमें उछाल आएगा,लेकिन जिस तरह केन्द्र सरकार ने कालेधन पर रोक लगाई है।और इनकमटैक्स विभाग ने नगद लेनदेन करने वालों को नोटिस भेजे है।इससे रियल एस्टेट में निवेश करने वाले लोगों की हालत खराब है।कई सौदागरों की पूँजी फंसी पड़ी है,और अधिकांशो के बयाने डूब गये है।जिन लोगों का आर्थिक आधार मजबूत है,वह लोग गले में रजिस्ट्रीया लटकाये इस उम्मीद में बैठे है कि भविष्य में रियल एस्टेट के कारोबार में उछाल आएगा।विशेषज्ञ बताते है कि लगभग एक दशक तक तो इसकी उम्मीद कम ही है।

ये हैं अहम समस्याएं :

1. नेचर ऑफ लैंड मे उलझ जाते हैं बिल्डर और ग्राहक।

2. कमिटमेंट के मुताबिक सुविधा नही उपलब्ध कराते बिल्डर।

उम्मीद :

 ऐसा समझा जाता है कि बारिश का सीजन वैसे ही रियल एस्टेट के कारोबार के लिए मंदा होता है। उम्मीद है कि दीवाली के पूर्व अक्टूबर माह से रियल एस्टेट के कारोबार में तेजी आयेंगी।


Saturday, June 25, 2016

जाय़का-ए-दिल्ली

जाय़का-ए-दिल्ली

देश की राजधानी दिल्ली, राजनीतिक केन्द्र के साथ अपने जायके के लिए भी प्रसिद्ध है गलियों के लजीज व्यंजनों से लेकर सात- सितारा होटलों के व्यंजनों में आपको देश के विभिन्न हिस्सों के व्यजंनो के साथ विदेशी व्यंजनों का स्वाद भी मिलेगा है। चांदनी चौक को प्रायः भारत की फूड-कैपिटल भी कहा जाता है जो अपने स्ट्रीट फूड के लिए प्रसिद्ध है जहाँ  स्नैक्स, चाट, पराठे, नमकीन के साथ ही मांसाहारी खानों के पुराने शौकीन हैं, वे मोती महल में बटर-चिकन का लुत्फ उठा सकते हैं।
तो आइयें जानते है दिल्ली के प्रसिद्ध व्यंजनों के बारे में
पराठे वाली गली के पराठे
पराठे वाली गली एक सकरी गली चाँदनी चौक नामक प्रसिद्ध बाज़ार में स्थित है। वहां काफी पुरानी पराठे बनाने वाली दुकाने हैं। यह एक भारतीय रोटी का विशिष्ट रूप है। यह व्यंजन उत्तर भारत में जितना लोकप्रिय है, लगभग उतना ही दक्षिण भारत में भी है, बस मूल फर्क ये है, कि जहां उत्तर में आटे का बनता है, वहीं दक्षिण में मैदे का बनता है। माना जाता है यहाँ के दुकानदार मुगलों के समय से पराठे बेच रहे हैं। जिसमे आपको पनीर,रबडी,गोभी,आलू,खोया,बादाम के पराठा प्रमुख है।
दिल्ली की चाट
दिल्ली की चाँदनी चौक की चटपटी चाट बहुत प्रसिद्ध है और अब तो यह दिल्ली चाट के रूप में भारत के कई हिस्सों मे बेची जाती है। यह चाट मिर्च मसाले से भरपूर होती है। यह चाट खाने मे जितनी स्वादिष्ट होती है

दिल्ली हाट का जायका
दिल्ली हाट में मिलने वाले स्वादिष्ट व्यंजन 'दिल्ली हाट' को ख़ास बनाते हैं। भारत के विभिन्न प्रांतों के व्यंजन की दुकानें यहाँ लगी हैं। 1994 में जब दिल्ली हाट की शुरुआत हुई थी तब देश के सभी पच्चीस राज्यों को यहाँ व्यंजन की दुकानें उपलब्ध करायी गई थीं ताकि यहाँ आने वाले लोग दूसरे प्रांतों के व्यंजनों का भी स्वाद ले सकें। भौगोलिक रूप से विविधताओं का देश तो हिन्दुस्तान है ही यहाँ के खान-पान में भी काफ़ी विविधता है। दिल्ली हाट में देश के सौ से ज़्यादा ख़ास व्यंजन उपलब्ध हैं। पंजाब के मक्के दी रोटी सरसों दा सागहो, बंगाल के माछेर-झोलऔर दक्षिण भारत के इडली डोसाहो यहाँ सभी उपलब्ध हैं। यहाँ बिहार के मशहूर लिट्टी-चोखा भी मिलता है।

Tuesday, June 14, 2016

कहानी जिंदगी की


जिंदगी में कभी- कभी कुछ ऐसा वाक्या भी हो जाता है जिससे जिदंगी बदल ही जाती है। समय था यही कोई शाम के सात बज रहे होगें, मैं और मेरा मित्र एक होटल में खाना खा रहे थे इसी दौरान एक बुर्जुग व्यक्ति नम आँखे लिए हमारी पास वाली टेबिल पर आकर बैठ गया। खाने का ऑर्डर लेने के लिए वेटर आया,शायद उस व्यक्ति ने  दाल-रोटी ऑर्डर किया था और वह व्यक्ति खाने के इंतजार में था, उस व्यक्ति के अकेलेपन को हम लोग भाप गये थे तो हमने उन्हे हम लोगे के साथ खाना खाने का आग्रह किया,पर वह मना करने लगे, किंतु हमारे बार-बार आग्रह करने वह मान गये और हमारे साथ आकर बैठ गये। तब तक वेटर खाना ले कर आ गया था और  खाने के साथ हमारी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया, उन्होने बताया कि वह रिटायर्ड IAS ऑफिसर है जो पास ही कॉलोनी में रहते है उनके दो बेटे और एक बेटी भी है दोनों बेटे विदेश मैं नौकरी करते है व बेटी मुम्बई में अपने परिवार के साथ रहती है।

हमने पूछा आपकी पत्नी कहाँ है तो वह शांत स्वर में बोल उठें। पिछले बर्ष ही निधन हो गया था और आँखे नम हो गयी।तो मेरे जहन मैं सवाल उठा आप अपने बेटों के साथ क्यों नहीं  रहतें? इस सवाल पर उनका सीधा जबाव था मैं जीवन के इस अंतिम दौर में अपनों से दूर नहीं रहना चाहता।
सवाल का  जबाव सुन कर हम दोनों आश्चर्यचकिंत हो गयें। तो उन्होंने बताया दोनों बेटों को दिन- रात अपनी नौकरी से समय नहीं मिलता। उनके पास बात करने का भी समय नहीं रहता,मैं उन लोगों के  साथ रहता हूँ तो मुझे ऐसा प्रतित होता है कि मैं होटल में रह रहा हूँ वहाँ सुविधायें तो सारी है किंतु सुकून नहीं है  जिंदगी भर ऐसे ही भाग दौड़ में दिन निकाले है अब मैं जीना चाहता हूँ तो आ गया अपनों के बीच। जहाँ मित्र मंडली, ओर जान-पहचान वालो से तो बात तो हो जाती है।
कभी-कभी बेटी के यहाँ भी  घूम आता हूँ किंतु वह लोग भी अपनी जिदंगी में व्यस्त है। तो आ जाता  हूँ अपने पुराने निवास स्ठान। जहाँ मेरा सारा बचपन व्यतित हुआ था।  बस थोड़ा दुख तब होता है जब अकेले खाना-खाने होटल में बैठता  हूँ और इसी चर्चा के साथ हमारा खाना हो चुका था  वेटर बिल लेकर आया।  जिसका पेमेंट उन्होंने ही किया।

साथ ही विदा लेते हुये उस इंसान केअंतिम शब्द थे

जिंदगी जीने का नाम है

Sunday, June 5, 2016

धर्म पर हावी होती राजनीति

एक दौर था लोग अपने धर्म के प्रति गहन आस्था रखते थे धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कई धार्मिक आयोजन कराये जाते थे किंतु आज वक्त बदल गया है लोगों के बीच आज धर्म व्यापारिक हो चला है वह धर्म से अपना प्रचार-प्रसार करते नजर आने लगे हैं कहीं कोई धार्मिक आयोजन व्यापार बढ़ाने तो कहीं राजनीतिक दलों के प्रचार के लिए धार्मिक आयोजन किए जाने लगे हैं जिन आयोजनों में वैदिक मंत्रों से ज्यादा तो राजनीतिक लोगों के नाम सुनाई ज्यादा देने लगे हैं। तो बताइए इन धार्मिक आयोजन का हिस्सा बनना चाहिए या नहीं।

Wednesday, March 23, 2016

‘शहर के रंगो के साथ खो गई। गाँव की होली’

आज मुझे गाँव को छोड़े हुए एक दशक से ज्यादा का समय बीत चुका है शहर की आवोहवा में मैंने न जाने कितने त्यौहारों को देखा है फिर भी न जाने जब भी कोई त्यौहार आता हैं मुझे गाँव ओर बचपन की याद आ ही जाती है फिलहाल तो होली के त्यौहार का आगमन हो रहा है होली का नाम सुनते ही मेरे मन-मतिष्क में बचपन ओर गाँव की होली के चित्र उभरने लगते है जहाँ सुनहरे खेत, गाँव की तंग गलियाँ ओर होली का उत्साह गाँव के प्रत्येक युवा, बड़े-बूड़े के साथ महिलाओं पर भी  खूब रहता था होली की पूर्व संध्या में ढोल-बाजे, फगुआ गीतो के साथ गाँव की प्रत्येक गली से जुलूस के साथ घूमना। अर्धरात्री में सामूहिक होली दहन। ओर सुबह होते ही यारों की टोली के साथ रंग- गुलाल से  होली के स्वागत करना। इसी के साथ होली के रंग, मेल- मिलाव,खाना –पीना रंग पचंमी तक चलता रहता था किंतु आज शहर में आने के साथ होली के रंग भी बदले से नजर आने लगे है यहाँ कैमिकल से रंगो का रंग तो गहरा हो गया है पर आपसी रंग फिके नजर आते  है होली तो होती है सिर्फ व्यापार की, स्वार्थ की , मतलब की। शायद शहर की व्यस्त जिंदगी में कुछ ही लोग मिलते है जो होली के रंगो को निस्वांर्थ भावना से देखते है।

 

इसी के साथ ही सभी परिजनों एवं मित्रों  को होली की अनंत शुभकामनाँए।

                                                    अखिलेश

                                                  9630263621

Thursday, March 17, 2016

"आया बसंत"

वहीं बसंत फिर हैं आया,

खुशियाँ अपने संग में लाया।


पेंड-पौधो के संग मे उसने,

धरा को है खूब सजाया।

हुआ बसंत का आगमन,

बोले है कोयलियाँ।

शीत लहर आयी है जैसे,

रोमे-रोम थिरकाया।

मन में भरी उमंग,

जैसे खुशियों को शैलाया।

प्रकृति ने ओढी चादर,

चारों ओर फैलायी।

वायु में भी गंध,

हल्की-हल्की आयी।

खेतों में लहरायी फसलें,

हरियाली है छायी।

देख बसंत का आगमन,

अखि हैं मुस्काये बोले,

देखो वही बसंत फिर है आया।                      #मुसाफिर

Sunday, March 13, 2016

"खुशियाँ"

खशियों के भी कई रूप होते है,
कई रंग ओर ठंग होते है।

जैसे माँ का प्यार,

पापा का दुलार,

अपनो का साथ,

पहले प्यार का अहसास।

बचपन के हठ,

गाँव के नट,

गली में रौव,

शहर में धौव।

गली का मोड़,

दोस्तों का शोर,

उसकी की हाय,

चाचा की चाय।

मेलों की मस्ती,

ठंडो की चुस्ती,

बर्फ के गोले,

बरसात के ओले।

टीचर की छडी,

हाथ की घड़ी,

परीक्षा की चिंता,

रिजल्ट का इंतजार।

                      #मुसाफिर

Saturday, March 12, 2016

"वक्त"


वक्त गुजरता रहा,
शामें ढलती रही।
फिर भी न जाने क्यों?
उम्मीद का दीपक,...
हर सुबह जलता रहा।
कभी तो वक्त की राहों में,
कोई मुसाफिर आएगा।
जो इस जलते हुए दीपक को,
नई दिशा दिखायेगा।
उसी अनजाने मुसाफिर के वास्ते,

                                                                       ये वक्त गुजरता रहा।
                                                                                                     #मुसाफिर

 

Monday, March 7, 2016

"हुआ सवेरा"

हुआ सवेरा।जाग रे!पंछी,

बड़ी दूर तूझे है जाना।

आँख खोल देख रे!पंछी

मंजिल हैं तूझको पाना।

         दूर खड़ी मंजिल है पंछी,

         देख रही है रस्ता तेरा।

         रस्ता क्या खोजे रे?पंछी,

         नील गगन है रस्ता तेरा।

पंख फैला उड़ जा रे।पंछी

मंजिल को है पाना।

हुआ सवेरा। जाग रे!पछी

बड़ी दूर तुझे है जाना।

                      #मुसाफिर